शान ऐ अवध

लखनऊ
हाँ अवधी हैं हम और लखनऊ हमारा है,
हाँ नवाब हैं हम और ये नवाबी का शहर हमारा है,
टुंडे के कबाब और वाहिद की बिरयानी हमारी है,

मेट्रो तो नयी है,
मियाँ चारबाग़ की रफ़्तार आज भी वही पुरानी है,

लोग शौक़ीन हैं यहाँ चाय के,
चिकन कारीगरी भी यहाँ की काफी पुरानी है,

आप आइयेगा कभी अमीनाबाद में,
यक़ीन मानिये हर एक दुकान अपने आप में नूरानी है,

हो सकता है दुनिया भर में पार्क आपको हज़ार मिले,
पर एशिया का तो सबसे बड़ा वाला ही हमारा है,

साहित्य की तो बात ना करिये,
राजकमल हमारा है,

हज़रत वाजिद अली शाह से लेकर कृष्ण बिहारी नूर हमारे हैं,

अगर शेर-ओ-शायरी सुननी हो तो मीर तक़ी मीर हमारे हैं,
दिख जाए गर कोई अजूबा,
तो याद रखना वो रूमी गेट हमारा है,

गणेश चतुर्थी हो या निकले मुहर्रम का जुलूस कोई,
हिन्दू मुस्लिम यकजहती का उदहारण हमारा है,

अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू ऐसा शायद ही कहीं और मिले,
तहज़ीब - अदब की बात ना करिये शान-ए-अवध हमारा है ।।

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